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लिखने को बहुत कुछ बचा होगा....

 

सारे युद्ध कहां लिखे गए अभी  ?
राख के ढेर पर बेशक 
नर्म घास उग आई हो ,
थोड़ा गहरा सा खोद के देखें
हड्डियां और बारूद सड़ा नहीं होगा।
 सब महामारियाँ खत्म कहां हुई अभी ?
बाहर से हम बीमार नहीं दिखते बस।
 किसी अंधेरे मैले कोने में
 बहुत से अनाम विषाणु 
अथक प्रतिरूप बना रहे होंगे। 
चीखें गूंज रही थी 
स्याह घने कोहरे के आर पार
अभी बेशक हल्की रोशनी हुई है
धुंधला सा दिखने लगा है आसमान।

सिर्फ वक्त का फर्क है शायद
या कुछ स्याहियां सूखने का इंतजार
 शब्दों के बीचोंबीच भी बहुत कुछ लिखा गया है
 जो अभी पढ़ा जाना बाकी है ।

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मेरे गाँव की कहानियां

छोटी सी बात थी। मैल ढोते हुए घोड़े ने अनजाने में बिजली के पोल को धक्का दे दिया था। और पोल भी ऐसा, की इस झटके से पूरी तरह हिल गया। तारें आपस में लिपट गयी । और फ्यूज़ उड़ गया। शाम होने को थी। हल्का हल्का अँधेरा भी छा रहा था। मेरे शांत गाँव में अचानक कुछ गलत हो गया था। शाम होते होते आजकल सड़कें सुनसान हो जाती हैं। कुछ पर आई पी एल का भूत सवार है तो कोई ताश छोलो का शौक़ीन । सड़क पर बतियाने का वक़्त आजकल किसी के पास नहीं है। पर आज गलत वक़्त पर बिजली गुल हो गयी थी। धीरे धीरे गाँव के लोग बाहर निकलने लगे। सड़क पर गहमा गहमी बढ़ गयी । लोग नाराज़ लग रहे थे। ऐसा लग रहा था कि बड़े दिनों बाद किसी मुद्दे पर लोग एक राय हो रहे थे। बेवक्त बिजली का जाना, अधूरे मैच का जाने क्या हुआ होगा, आज लोग एक दुसरे से बातें कर रहे थे। फिर कोई खबर लाया कि गाँव के दुसरे हिस्से में पोल के साथ हादसा हो गया है।झटपट लाइन मैन को फ़ोन मिलाया गया।

रोहतांग खुल गया..!!

अभी जाग जाओ रोहतांग छोड़ दो आलस अपनी सफ़ेद चादर से निकलो बहुत हुई, लम्बी शीत निद्रा अगले चंद दिनों में न जाने कितने लोग चढ़ आयेंगे तेरी चोटियों तक तेरी सफ़ेद चादर को एक अजूबे की तरह ताकते कुचल डालेंगे फिर उसी को खुशी और उल्लास में समय से पहले छीन लेंगे तुमसे मैली कर देंगे अपने जूतों में चिपकी मैदानों कि धूल से डरा के रख देंगे अपने शोर और हजारों होर्स पॉवर से साथ ले आयेंगे अपनी मुश्किलें गंदगी , दुःख, बैचैनी और जाने क्या क्या रोंदते हुए गुज़र जायेंगे न जाने कहाँ कहाँ अभी वक्त है उठ बैठो मना कर दो किसी की सैरगाह बनने से इतने जोर से दहाडो कि हिमयुग फिर से लौट आए बस... 'उस' आदमी को मत रोकना जो सदियों से तुमसे होता हुआ अपने घर जाता है

across the mountain

first day was very exciting.....we planned to travel from kolang to leh on motorbikes...the very idea of this adventurous trip was exciting us..idea came to me. ..on one fine sunday sipping hot tea at ga tashi's dhaba ..we have a small but dependable group of friends for such ideas to emerge freely.our group is not bound by common age factor but by common interest.so..proposal was immediatly voted upon and passed.dates were fixed...a couple of liquor meetings to check the preparations ..and we were ready.i had this desire to travel to ladakh and spiti since the time i was appointed here ...two great places to visit being a lahuli and a buddhist.so ....one of my dream was coming true.there is some "thing" about these places that seems attractive to me..a mystic attraction.so my idea of this journey is not that of a tourist..visiting a new place with amusement and wonder,i wanted to discover myself...the source of my mystic attraction,a desperate attempt of an uprooted budd