अभी जाग जाओ रोहतांग छोड़ दो आलस अपनी सफ़ेद चादर से निकलो बहुत हुई, लम्बी शीत निद्रा अगले चंद दिनों में न जाने कितने लोग चढ़ आयेंगे तेरी चोटियों तक तेरी सफ़ेद चादर को एक अजूबे की तरह ताकते कुचल डालेंगे फिर उसी को खुशी और उल्लास में समय से पहले छीन लेंगे तुमसे मैली कर देंगे अपने जूतों में चिपकी मैदानों कि धूल से डरा के रख देंगे अपने शोर और हजारों होर्स पॉवर से साथ ले आयेंगे अपनी मुश्किलें गंदगी , दुःख, बैचैनी और जाने क्या क्या रोंदते हुए गुज़र जायेंगे न जाने कहाँ कहाँ अभी वक्त है उठ बैठो मना कर दो किसी की सैरगाह बनने से इतने जोर से दहाडो कि हिमयुग फिर से लौट आए बस... 'उस' आदमी को मत रोकना जो सदियों से तुमसे होता हुआ अपने घर जाता है
memoirs of a native
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