Sunday, March 30, 2014

आज का गीत

आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखने का मन हुआ। अभी एक रिटायरमेंट पार्टी से लौट रहा हूँ।  बहुत दिनों बाद कुछ नया देखने को मिला।  कुछ तस्वीरें अपलोड कर रहा हूँ।  देखिये और सोचिये कि हम कहाँ पहुँच चुके हैं।  ये तस्वीरें  जिमी का है।  जो अपनी माँ कि रिटायरमेंट के मौके पर स्टेज पर गा रहा है। ये तस्वीरें अन्य समाजों के लिए भले ही आम हो पर हमारे समाज मैं अजूबे कि तरह देखी जाएँगी।लाहुल अपनी सभी धारणाओं और रूढ़ियों को साथ लिए हुए कुल्लू मनाली के कस्बों मैं फल फूल रहा है। इन तस्वीरों को देखिये और समझने की कोशिश कीजिये कि आज हम अपनी सोच से बेहद आगे निकल चुके हैं। ये हमारे समाज मैं आ चुके एक आत्मविश्वास का प्रतीक है।जिम्मी को गाते हुए देख बहुत अच्छा लगा।इसकी वजह सिर्फ ये नहीं थी कि वो बहुत अच्छा गाता है पर शायद ये कि इस समाज ने अपने गीत और अपना मंच पा लिया है। बहुत से  लोग समाज के उस वर्ग को अच्छी नज़र से नहीं देखते जो तरक्की कर के बाहर निकल गया।  escapism और migratory टेंडेंसी जैसे शब्द इस वर्ग के लिए  प्रयोग किये जाते हैं।  मैं हमेशा से मानता था कि लाहुल का समाज एक ट्रांज़िशन या तेज़ परिवर्तन के दौर से गुज़रता हुआ समाज है। इस दौर मैं हमेशा भ्रांतियां टूटती और बनती रहती हैं। एक और बात जिसे मैं नहीं मानता वो है इस समाज का (जो लाहुल से बाहर है), लाहुल की तरक्की मैं हाथ न होना। समाज का कोई भी हिस्सा अकेले तरक्की नहीं कर सकता। इस वर्ग ने हमेशा अपने दूसरे हिस्से को विकास के लिए प्रेरित किया है। सब जुड़े हुए लोग एक साथ चलते हैं।एक दूसरे के सुख दुःख में साथ देते हुए। कुछ देर के लिए आलोचना छोड़ के देखें तो तस्वीर अच्छी लगने लगेगी।  सच मानिये मैं आज बहुत खुश हूँ। ये नशा जो इस वक़्त फ़ील कर रहा हूँ वो उस महँगी शराब का नहीं है बल्कि इस खयाल  का है जो अभी आप से शेयर कर रहा हूँ। बहुत सारे सवाल हैं जो मुख्यधारा से जुड़ने के बारे में डिसकस होते हैं अपनी पहचान खोने का डर भी बहुत लोगों के मन मैं देखता हूँ।  मैं खुद भी उसी सोच का एक हिस्सा हूँ जो लाहुल कि हर छोटी बड़ी धरोहर को सहेज कर रखने का सपना देखते हुए बड़ा होता है।   पर इन युवाओं के आत्मविश्वास को देख कर ना जाने क्यों खोने और छूट जाने का डर कहीं पीछे रह जाता है और हम  उसके गीतों के साथ झूमने लगते हैं। क्या कोई भी समाज अपनी नयी और पुरानी पहचान से सामंजस्य नहीं बिठा सकता ? अगर आप आशावादी हैं तो जवाब हाँ है अगर नहीं तब भी समाज तो आगे बढ़ ही रहा है आप कुढ़ते हुए ही सही उसके साथ बढ़ते रहेंगे। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और वही समाज grow करता है जो उस बदलाव से अपने को जोड़ के देखे। इस सब शोर शराबे के बीच असली और आभासी के प्रश्न  धुंधले पड़ जाते हैं और हम मिल कर इस नयी पीढ़ी को appreciate करना शुरू कर देते हैं।