Sunday, August 22, 2010

मोक्ष के लड्डू

कभी खाये हैं मोक्ष के लड्डू?


तुम क्या जानो किन मुश्किलों से

उन बटुक भिक्षुओं के चंगुलों से

छीन के लाया था मैं अपना बुद्धत्व....

उस दम घोंटती भीड़ से लड़कर

कैसे चुरा पाया था

थोडा सा धर्म, कुछ ग्रंथों के अंश

और चुटकी भर परिनिर्वाण

आसान नहीं था उस शोर में

महामहिम को छू के हर दुःख का अंत होना

आज कर आया हूँ मैं अपने हिस्से कि साधना

मैंने आज बौद्ध होने का अर्थ पा लिया है

No comments: